मॉं :मैं हर योद्धा को नमन करता हूं, जिसने चमत्कार नहीं किये


(यह कविता उन सभी माताओं के लिए है जो अपने बच्चों और अपने परिवार के लिए सड़क पर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चली )









गर्मियों
  की लू                                                                 

सुनसान रास्ते

लेकर चली मुझे अनजान रास्ते,


कुछ दूर है घर अपना
कह कर चली।


महामारी के इस दौर में
जीवन बना था चुनौती जिंदगी अमानत।

सुबह शाम दिन रात अनवरत चले थे हम।


अंधियारी रात से डरी थी ,
हर रोज लाशों के ढेर जिंदा रहने की जद्दोजहद
सुनसान रास्ते गीली सड़के घनी राते।
बनकर निडर बाहों में भर बचाने चली थी,
सूरज की रोशनी से खिले थे हम।


अंधमुदी आंखों से तकता  तुझे
तेरी हृदय की वेदना ,पलकों पर आंसु।


डर के नासुरो पर नश्तर बनी
मेरे जीवन की सार्थकता मेरा अस्तित्व बनी।

                                                                        -  पीयूष कुमार




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