'' मंजिल की तलाश ''
मैं किसी मंजिल की तलाश में नहीं
आलम ये है
मुझे रुकना बर्दाश्त
नहीं,
जिजीविषा यही जीवन
की बदलू नियति।
है कुछ नहीं
निर्धारित यहां
हर क्षण मानव
बनता और मिटता,
हर पल छल
प्रपंच रस्ता।
परिस्थितियों
का रोना रोता
चमत्कारी
शक्तियों के पीछे
फिरता।
जिजीविषा
यही जीवन की,
सत्य को स्वीकार करूं,
दूजे के विचारों
का सम्मान
सार्थक जीवन का
न अपमान करूं।
पीयूष कुमार

💯💯
ReplyDeletethank u deepak
DeleteBrother you are like a professional writer 🥰🥰🥰🥰🥰🥰👏👏👏👏👏👏👏👌👌👌👌👌❤❤❤❤❤❤❤❤❤
ReplyDeleteSuper 👌
ReplyDeleteBahut khub 👌👌
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